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बिहार की धरती पर अपराध और बुलडोजर का राज नहीं,इंसाफ का राज चलेगा:
बिहार आज एक गहरे और खतरनाक दौर से गुजर रहा है। यह दौर राज्य सत्ता द्वारा संगठित अन्याय, दमन और भय के राज का है। एक ओर हत्या, लूट, बलात्कार, अपहरण और सामंती-माफियाई हिंसा आम जनता की रोज़मर्रा की सच्चाई बनती जा रही है। दूसरी ओर नीतीश–मोदी की साझा सरकार बुलडोजर को “सुशासन” का मुखौटा पहनाकर गरीबों, दलितों, महादलितों और मेहनतकशों पर सीधा हमला कर रही है। बिहार में आज कानून का नहीं, बल्कि सत्ता-संरक्षित अपराधियों और बुलडोजर का बोलबाला है। राज्य में अपराध बेलगाम हैं। छोटे-छोटे विवादो


नरकटियागंज में आरवाईए बिहार राज्य परिषद की दो दिवसीय बैठक संपन्न, बजट सत्र में विधानसभा मार्च का ऐलान:
पश्चिम चंपारण के नरकटियागंज में इंकलाबी नौजवान सभा (आरवाईए) बिहार राज्य परिषद की दो दिवसीय बैठक 10- 11 जनवरी को संपन्न हुई। बैठक में बिहार भर से आए राज्य परिषद सदस्यों के साथ-साथ संगठन के राष्ट्रीय महासचिव नीरज कुमार और राष्ट्रीय अध्यक्ष अजीत कुशवाहा ने भाग लिया। बैठक में बिहार के नौजवानों के सामने खड़े रोजगार संकट, सरकार की नीतियों और आगामी आंदोलनात्मक कार्यक्रमों पर विस्तार से चर्चा हुई। बैठक के बाद आरवाईए ने ऐलान किया कि बिहार विधानसभा के आगामी बजट सत्र के दौरान हजारों नौ


नागरिक अधिकारों की बात करने वाले उमर-शरजील को बिना ट्रायल जेल वहीं बलात्कारी गुरमीत सिंह को 15वीं बार पैरोल।
5 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने गुलफिशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शिफ़ा उर रहमान, मोहम्मद सलीम ख़ान और शादाब अहमद को ज़मानत दे दी, लेकिन उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को ज़मानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने उन्हें यह ‘अनुमति’ दी है कि वे एक वर्ष बाद या संरक्षित गवाहों के बयान दर्ज हो जाने के बाद—जो भी पहले हो—दोबारा ज़मानत के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह न्याय का घोर मज़ाक है कि पाँच साल से अधिक समय तक जेल में रहने के बावजूद ना तो कोई ट्रायल चलाया जा रहा है और ना ही ज़मानत दी जा रह


बलात्कारियों को संरक्षण, पीड़िताओं पर दमन यही है मोदी राज का असली चरित्र
बलात्कारी और हत्यारे कुलदीप सिंह सेंगर को ज़मानत मिल जाना कोई साधारण न्यायिक घटना नहीं है। यह उस सड़े-गले, स्त्री-विरोधी और सत्ता-संरक्षित तंत्र का नग्न प्रदर्शन है, जिसमें अपराधी सत्ता के संरक्षण में आज़ाद घूमते हैं और न्याय माँगने वाली महिलाएँ पुलिस की लाठियों और हिरासत का शिकार बनती हैं। यह फैसला केवल एक व्यक्ति को ज़मानत देने का मामला नहीं, बल्कि यह मोदी सरकार और भाजपा-आरएसएस के महिला-विरोधी चरित्र पर एक और काला धब्बा है। उत्तर प्रदेश के उन्नाव से पूर्व भाजपा विधायक कुलदी


अरावली की लूट को सुप्रीम कोर्ट की ढाल,मोदी सरकार का पर्यावरण-विरोधी एजेंडा बेनकाब
ऐसे दौर में जब दिल्ली और उसके आसपास का पूरा इलाका ज़हरीली हवा में दम घुटने की कगार पर है, जब मज़दूर, गरीब, बच्चे और बुज़ुर्ग प्रदूषण के सीधे शिकार बन रहे हैं ठीक उसी समय फ़ासीवादी मोदी सरकार के नेतृत्व में, देश की सबसे प्राचीन और संवेदनशील पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली को पूँजीवादी लूट के हवाले करने में जुटी हुई है। 20 नवम्बर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच द्वारा दिया गया हालिया फ़ैसला इसी लूट-नीति की कड़ी है, जिसने अरावली पर्वत श्रृंखला की परिभाषा को बदलते हुए बड़े पैम


अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ां– रामप्रसाद बिस्मिल शहादत दिवस के मौके पर देशभर में हुआ कैंडल मार्च- "साझी शहादत-साझी विरासत" को जिंदा रखने का लिया गया संकल्प।
अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ां और रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के शहादत दिवस के अवसर पर आरवाईए ने देश भर में “एक शाम साझी शहादत – साझी विरासत के नाम” कार्यक्रम का आयोजन किया। कैंडल मार्चों के माध्यम से आज़ादी आन्दोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई, उनकी जिंदगी, उनके विचारों और प्रेरणा देने वाले किस्सों को याद किया गया, साथ ही आज़ादी की लड़ाई में सांप्रदायिक नफ़रत के खिलाफ़ साझे सपनों, साझे संघर्षों और साझी कुर्बानियों पर चर्चा हुई। नौजवानों ने शहीदों के "सपनों के भारत" के लिए संघर्ष को तेज़ करने क


इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र-आंदोलन की जीत विश्वविद्यालय बचाने की एक उम्मीद है!
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र पीने के लिए साफ़ पानी, स्वच्छ शौचालयों और लाइब्रेरी में पढ़ाई की समय सीमा को बढ़ाने जैसे मुद्दों को लेकर समय-समय पर आंदोलन करते रहे हैं। नियम अनुशासन के नाम पर छात्रों से बदसलूकी भी नई नहीं है, जैसे कि आईडी कार्ड चेक करने के नाम पर छात्र-छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार किया जाना। दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक केंद्रीय विश्वविद्यालय होने के बावजूद इलाहाबाद विवि. इस तरह की मूलभूत सुविधाओं के अभाव का शिकार तो रहा ही है साथ ही आवाज़ उठाने पर छात्रों को प्रशा


ডিটেক্ট–ডিলিট–ডিপোর্টের ছায়ায় ভোটার তালিকা সংশোধন
গত ৪ঠা নভেম্বর থেকে পশ্চিমবঙ্গে বিশেষ নিবিড় সংশোধনী শুরু হয়। এই প্রক্রিয়া ঘোষণার পর থেকেই রাজ্যজুড়ে ভয় ও আশঙ্কার আবহাওয়া তৈরি হয়। এই প্রক্রিয়া ঘোষণার পর থেকে শুভেন্দু অধিকারী থেকে সুকান্ত মজুমদারের মত রাজ্যের বিজেপি নেতাদের হুমকিপূর্ণ আস্ফালন গরিব, খেটে খাওয়া, প্রান্তিক মানুষদের আরও আশঙ্কায় ফেলে। এই প্রক্রিয়ায় যে কাগজ বা নথি নির্বাচন কমিশন চেয়েছে সেগুলির বেশিরভাগই গরিব, খেটে খাওয়া মানুষের কাছে নেই। ভারতবর্ষের যেকোনো প্রান্তে সরকারি নথি সর্বস্তরের মানুষের কাছে সমানভাবে থাকে না
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