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नागरिक अधिकारों की बात करने वाले उमर-शरजील को बिना ट्रायल जेल वहीं बलात्कारी गुरमीत सिंह को 15वीं बार पैरोल।


5 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने गुलफिशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शिफ़ा उर रहमान, मोहम्मद सलीम ख़ान और शादाब अहमद को ज़मानत दे दी, लेकिन उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को ज़मानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने उन्हें यह ‘अनुमति’ दी है कि वे एक वर्ष बाद या संरक्षित गवाहों के बयान दर्ज हो जाने के बाद—जो भी पहले हो—दोबारा ज़मानत के लिए आवेदन कर सकते हैं।
यह न्याय का घोर मज़ाक है कि पाँच साल से अधिक समय तक जेल में रहने के बावजूद ना तो कोई ट्रायल चलाया जा रहा है और ना ही ज़मानत दी जा रही है। 
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने यहाँ तक कहा कि देरी ज़मानत के लिए कोई ‘ट्रम्प कार्ड’ नहीं है! उमर और शरजील अब भी विचाराधीन क़ैदी के रूप में जेल में बंद हैं, जो भारतीय नागरिकों के न्याय और संवैधानिक स्वतंत्रता के सभी सिद्धांतों का उल्लंघन है।

वहीं गुरमीत राम रहीम जैसे दोषसिद्ध बलात्कारियों को 15वीं बार पैरोल दी जाती है और उन्हें जेल से बाहर रहने की अनुमति मिलती है। यह न्याय के सिद्धांतों का मजाक नहीं तो और क्या है। 
इस देश की संस्थाएं, न्यायिक प्रणाली इस तरह से भाजपा–आरएसएस को संतुष्ट करने के लिए काम करने लगे तो अब तक हासिल किए आजादी, बराबरी, न्याय, लोकतंत्र के मूल्य सब के सब दफ्न हो जाएंगे। 
देश में संवैधानिक स्वतंत्रताओं पर भाजपा आरएसएस के कब्जे के खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत है। 
आरवाईए

 
 
 
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