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अरावली की लूट को सुप्रीम कोर्ट की ढाल,मोदी सरकार का पर्यावरण-विरोधी एजेंडा बेनकाब


ऐसे दौर में जब दिल्ली और उसके आसपास का पूरा इलाका ज़हरीली हवा में दम घुटने की कगार पर है, जब मज़दूर, गरीब, बच्चे और बुज़ुर्ग प्रदूषण के सीधे शिकार बन रहे हैं ठीक उसी समय फ़ासीवादी मोदी सरकार के नेतृत्व में, देश की सबसे प्राचीन और संवेदनशील पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली को पूँजीवादी लूट के हवाले करने में जुटी हुई है। 20 नवम्बर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच द्वारा दिया गया हालिया फ़ैसला इसी लूट-नीति की कड़ी है, जिसने अरावली पर्वत श्रृंखला की परिभाषा को बदलते हुए बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और खनन गतिविधियों के लिए क़ानूनी रास्ते खोल दिए हैं। यह फ़ैसला पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के नेतृत्व वाली समिति की सिफ़ारिशों को स्वीकार करते हुए दिया गया है। यह अपने आप में इस बात का सबूत है कि कैसे न्यायिक संस्थाएँ भी आज कॉरपोरेट-परस्त राज्य की नीतियों के आगे समर्पण करती जा रही हैं। नयी परिभाषा के अनुसार, अरावली ज़िलों में केवल वही स्थलाकृतियाँ “अरावली पहाड़ी” मानी जाएँगी जिनकी ऊँचाई स्थानीय उच्चावच (समतल भूमि पर पाए जाने वाले टीले, उतार चढ़ाव आदि) से 100 मीटर या उससे अधिक हो, और 500 मीटर के भीतर स्थित दो या अधिक ऐसी पहाड़ियाँ ही “अरावली पर्वत श्रृंखला” कहलाएँगी। यह तकनीकी और कृत्रिम परिभाषा असल में अरावली के विशाल भूभाग को संरक्षण के दायरे से बाहर धकेलने की साज़िश है। इस फ़ैसले का सीधा नतीजा यह होगा कि अरावली के 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र, जिनमें घासभूमियाँ, रिज क्षेत्र (दो ओर से ढाल युक्त ऊंचा संकरा क्षेत्र) और जैव-विविधता से भरपूर भूभाग शामिल हैं, अब पर्यावरणीय सुरक्षा से बाहर हो जाएँगे। इसका मतलब है अंधाधुंध खनन, वनों की कटाई, रियल एस्टेट परियोजनाएँ और कॉरपोरेट मुनाफ़े की असीम छूट। यह फ़ैसला न सिर्फ़ अरावली के लिए, बल्कि उत्तर भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए एक ऐतिहासिक अपराध है।
इतिहास गवाह है कि हरियाणा के सात अरावली ज़िलों में लाइसेंस प्राप्त खनन ने पहले ही चरखी दादरी और भिवानी जैसे इलाक़ों में दो अरब वर्ष पुरानी पर्यावरणीय विरासत को तबाह कर दिया है। 2009 में वैध खनन पर प्रतिबन्ध के बावजूद, अवैध खनन आज भी बिना रोक-टोक जारी है। राज्य मशीनरी या तो आँख मूँदे हुए है या खुली मिलीभगत में शामिल है। अब सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद अवैध खनन को भी वैधता दिलाने की ज़मीन तैयार की जा रही है। यह हमला सिर्फ़ अरावली तक सीमित नहीं है। यह उसी व्यापक पूँजीवादी-फ़ासीवादी हमले का हिस्सा है, जिसे मोदी सरकार ने पिछले एक दशक में और तेज़ किया है। मध्य और पूर्वी भारत के जंगल, पश्चिमी घाट, हिमालयी क्षेत्र हर जगह कॉरपोरेट लूट के लिए रास्ते साफ़ किए गए हैं। इसके नतीजे सबके सामने हैं आदिवासियों और स्थानीय समुदायों का जबरन विस्थापन, जंगलों की तबाही, नदियों का प्रदूषण और जलवायु संकट की तीव्रता में बेतहाशा वृद्धि।

वन संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2023, पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) मसौदा अधिसूचना, 2020, और 2020 में वाणिज्यिक खनन के लिए कोयला ब्लॉकों का आवंटन ये सभी क़दम इसी दिशा में उठाए गए हैं। हसदेव अरण्य, तलाबीरा, देहिंग पटकाई जैसे उदाहरण साफ़ दिखाते हैं कि कैसे पर्यावरणीय क़ानूनों को कमज़ोर कर पूँजीपतियों के लिए जंगलों को कुर्बान किया गया। अरावली पर हमला इसी सिलसिले की अगली कड़ी है। मोदी सरकार और उसकी राज्य मशीनरी यह भली-भाँति जानती है कि अरावली पर्वत श्रृंखला उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक ढाल है। यह रेगिस्तान के फैलाव को रोकती है, भूजल को रिचार्ज करती है और दिल्ली-एनसीआर की हवा को किसी हद तक सांस लेने लायक़ बनाए रखती है। इसके बावजूद, मुनाफ़े के लालच में इस पारिस्थितिकी तंत्र को बर्बाद करने का फ़ैसला लिया गया है। यह पूँजीवादी व्यवस्था की वही अंधी मुनाफ़ाखोरी है, जो इंसान और प्रकृति—दोनों को तबाही की ओर धकेल रही है। जब सरकार खुद मानती है कि वायु प्रदूषण जानलेवा स्तर पर पहुँच चुका है तब दिल्ली के सुखदेव विहार जैसे इलाक़ों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई कराना इस बात का जीता-जागता सबूत है कि सरकार के पर्यावरण-संरक्षण के दावे कितने खोखले हैं। हज़ारों लोग प्रदूषण से मर रहे हैं, सूखा और बाढ़ बार-बार तबाही मचा रहे हैं, हीटवेव रिकॉर्ड तोड़ रही हैं, भूजल का स्तर गिर रहा है और जंगल जल रहे हैं। फिर भी सरकार पूँजीपति वर्ग के लिए क़ानूनी रास्ते निकालने में जुटी हुई है।

इस पूरे संकट का बोझ अंततः मेहनतकश जनता पर ही पड़ता है। मज़दूरों, किसानों, शहरी गरीबों और आने वाली पीढ़ियों पर। यह स्पष्ट है कि पर्यावरण का सवाल आज वर्ग-संघर्ष का सवाल बन चुका है। यह लड़ाई सिर्फ़ पेड़ों और पहाड़ों की नहीं, बल्कि इंसान के अस्तित्व की लड़ाई है। आज ज़रूरत है कि छात्र, नौजवान, मज़दूर, किसान और सभी जागरूक नागरिक एकजुट हों। अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण के लिए एक निर्णायक, संगठित और संघर्षशील आंदोलन खड़ा किया जाए। यह संघर्ष केवल अरावली तक सीमित नहीं रहना चाहिए यह हर उस जंगल, हर उस नदी और हर उस पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा का संघर्ष है, जिसे मुनाफ़ाखोर पूँजीवादी व्यवस्था निगल जाना चाहती है। अरावली को बचाना मतलब भविष्य को बचाना। मोदी सरकार की पर्यावरण-विरोधी, कॉरपोरेट-परस्त नीतियों के ख़िलाफ़ निर्णायक प्रतिरोध ही आज का रास्ता है। लूट के इस तंत्र को चुनौती दें! अरावली बचाएं! धरती बचाएं।
वतन कुमार


 
 
 
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