अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ां– रामप्रसाद बिस्मिल शहादत दिवस के मौके पर देशभर में हुआ कैंडल मार्च- "साझी शहादत-साझी विरासत" को जिंदा रखने का लिया गया संकल्प।
- Dec 21, 2025
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अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ां और रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के शहादत दिवस के अवसर पर आरवाईए ने देश भर में “एक शाम साझी शहादत – साझी विरासत के नाम” कार्यक्रम का आयोजन किया। कैंडल मार्चों के माध्यम से आज़ादी आन्दोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई, उनकी जिंदगी, उनके विचारों और प्रेरणा देने वाले किस्सों को याद किया गया, साथ ही आज़ादी की लड़ाई में सांप्रदायिक नफ़रत के खिलाफ़ साझे सपनों, साझे संघर्षों और साझी कुर्बानियों पर चर्चा हुई। नौजवानों ने शहीदों के "सपनों के भारत" के लिए संघर्ष को तेज़ करने का पुरज़ोर आह्वाहन किया।
झारखण्ड के देवघर में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आरवाईए के राष्ट्रीय महासचिव कॉमरेड नीरज कुमार ने कहा कि आज जब देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक दिया गया है तब हमें अशफ़ाक-बिस्मिल और भी ज्यादा याद आते हैं, जिन्होंने अपनी सरजमीं, अपने मुल्क को ब्रिटिश हुकूमत से आज़ाद कराने के लिए शहादत दी। अशफ़ाक-बिस्मिल की दोस्ती की मिसाल का एक किस्सा आज भी बहुत मशहूर है, जब ब्रिटिश हुकूमत के दौरान तस्द्दुक हुसैन दिल्ली के SP हुआ करते थे। उन्होंने अशफ़ाक और बिस्मिल की दोस्ती को हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेलकर तोड़ने की भरसक कोशिश की। अशफ़ाक को बिस्मिल के खिलाफ भड़काकर वो ब्रिटिश राज के मुताबिक बयान दिलवाना चाहते थे, पर अशफ़ाक भारतीय क्रांतिकारी जत्थे के खिलाफ़ कुछ भी बोलने को राज़ी नहीं थे। ऐसे में उन्होंने एक रोज़ अशफ़ाक का बिस्मिल पर से विश्वास तोड़ने के लिए कहा कि बिस्मिल ने सच बोल दिया है और सरकारी गवाह बन गया है। इस पर अशफ़ाक ने SP को हंसते हुए जवाब दिया- "खान साहब! पहली बात, मैं पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को आपसे कहीं बेहतर तरीके से जानता हूं और जैसा आप कह रहे हैं, वो ऐसे इंसान तो बिल्कुल भी नहीं हैं, इसलिए ऐसे पैंतरे आज़माने का कोई फ़ायदा नहीं।

आज भाजपा की सरकार देश को बाँटने के लिए संगठित होकर सत्ता का इस्तेमाल कर रही है। देश में सांप्रदायिक नफ़रत का ज़हर घोला जा रहा है। नौजवानों को उन्मादी बना कर समाज में नफ़रत फ़ैलाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकार सांप्रदायिक नफ़रत की आड़ में नौजवानों से रोज़ी-रोटी के अवसरों को छीन कर, अपने कारपोरेट यारों के मुनाफ़े के लिए सस्ता लेबर मुहैया करा रही है।
डीकोलोनाइजेशन (उपनिवेश राज से मुक्ति) के नाम पर देश ने संघर्ष के दम पर जो भी अधिकार हासिल किए थे आज उसे सोची समझी साज़िश के तहत छीना जा रहा है। अभी सरकार द्वारा "चार नए लेबर कोड" लाकर पुराने श्रमिक अधिकार को छीना जाना इसका उदाहरण है। ऐसे समय में नौजवानों के कन्धों पर यह ज़िम्मेदारी है कि आपने शहीदों से प्रेरणा लेकर देश की आज़ादी, संविधान, लोकतंत्र, भाईचारे व अपने अधिकारों को बचाने के लिए संगठित हो कर इस दौर का मुकाबला करें।
नेताओं ने कहा कि अशफ़ाक़ उल्ला ख़ां और रामप्रसाद बिस्मिल की शहादत इस बात का जीवंत प्रमाण है कि भारत की आज़ादी की लड़ाई किसी एक धर्म, जाति या समुदाय की नहीं थी। यह लड़ाई थी शोषण के खिलाफ, साम्राज्यवाद के खिलाफ और इंसान की बराबरी व हक़ के लिए। अंग्रेज़ी हुकूमत के फांसीघर में भी अशफ़ाक़ और बिस्मिल ने नफ़रत नहीं, मोहब्बत और इंक़लाब की विरासत कायम की। आज जब सत्ता समर्थित ताक़तें इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रही हैं, तब उनकी साझी शहादत को याद करना अपने आप में एक प्रतिरोध है।





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