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बलात्कारियों को संरक्षण, पीड़िताओं पर दमन यही है मोदी राज का असली चरित्र



बलात्कारी और हत्यारे कुलदीप सिंह सेंगर को ज़मानत मिल जाना कोई साधारण न्यायिक घटना नहीं है। यह उस सड़े-गले, स्त्री-विरोधी और सत्ता-संरक्षित तंत्र का नग्न प्रदर्शन है, जिसमें अपराधी सत्ता के संरक्षण में आज़ाद घूमते हैं और न्याय माँगने वाली महिलाएँ पुलिस की लाठियों और हिरासत का शिकार बनती हैं। यह फैसला केवल एक व्यक्ति को ज़मानत देने का मामला नहीं, बल्कि यह मोदी सरकार और भाजपा-आरएसएस के महिला-विरोधी चरित्र पर एक और काला धब्बा है। उत्तर प्रदेश के उन्नाव से पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर, अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया बलात्कारी और हत्यारा है।  वर्ष 2017 में उसने एक नाबालिग लड़की का अपहरण कर बलात्कार किया। जब पीड़िता ने न्याय की आवाज़ उठाई, तो सत्ता और पुलिस ने अपराधी के साथ खड़े होकर पीड़िता को कुचलने की साजिश रची। 9 अप्रैल 2018 को पीड़िता के पिता को झूठे मुकदमे में गिरफ्तार किया गया और पुलिस हिरासत में उनकी संदिग्ध मौत हो गई। यह सत्ता के संरक्षण में रची गई हत्या की साजिश थी। इतना ही नहीं, 28 जुलाई 2019 को न्यायिक हिरासत में रहते हुए भी सेंगर ने अपने गुर्गों के ज़रिए पीड़िता की कार को दुर्घटनाग्रस्त करवाया।  इस सुनियोजित हमले में पीड़िता के दो रिश्तेदारों और उसके वकील की जान चली गई। यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक भयावह उदाहरण है, जहाँ एक सत्ताधारी पार्टी का नेता जेल के भीतर से भी हत्या और आतंक का खेल खेलता रहा। ऐसे व्यक्ति को दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा ज़मानत दिया जाना केवल न्यायिक विवेक पर सवाल नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक दबाव और वैचारिक झुकाव को भी उजागर करता है, जिसमें ताक़तवर अपराधियों के लिए कानून लचीला और गरीब-कमज़ोर पीड़ितों के लिए बेरहम बन जाता है। इससे भी अधिक शर्मनाक और आक्रोशजनक तथ्य यह है कि जब बलात्कार पीड़िता और उसकी माँ न्याय की गुहार लेकर इंडिया गेट पहुँचीं, तो दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। सवाल यह है कि अपराधी आज़ाद और पीड़िता गिरफ़्तार यह कैसा न्याय है? क्या मोदी सरकार के राज में न्याय माँगना अपराध बन गया है? यह कोई अकेला मामला नहीं है। भाजपा-आरएसएस शासन में यह एक स्थापित पैटर्न बन चुका है। हाथरस से लेकर उन्नाव तक, बिलकिस बानो से लेकर महिला पहलवानों तक हर जगह पीड़िताओं को चुप कराने की कोशिश की गई और अपराधियों को बचाया गया। भाजपा सांसद बृज भूषण शरण सिंह पर देश की महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए, लेकिन आज वह सत्ता के संरक्षण में बेख़ौफ़ घूम रहा है। यही है “बेटी बचाओ” का असली चेहरा। भाजपा-आरएसएस की राजनीति मनुस्मृति की उसी सोच से संचालित है, जहाँ महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है। जहाँ सत्ता, पितृसत्ता और ब्राह्मणवादी वर्चस्व मिलकर महिलाओं की आवाज़ को कुचल देते हैं। जहाँ बलात्कारी “संस्कारी” और पीड़िता “चरित्रहीन” घोषित कर दी जाती है। मोदी सरकार लगातार यह दावा करती है कि वह महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि उसकी पुलिस, उसकी सरकार और उसका राजनीतिक तंत्र तीनों मिलकर बलात्कारियों की ढाल बन चुके हैं। यह सरकार न्याय की नहीं, बल्कि दमन की सरकार है। यह सरकार संविधान की नहीं, बल्कि मनुस्मृति की सरकार है। आज ज़रूरत है कि इस अन्याय के खिलाफ़ पूरे देश में आवाज़ बुलंद की जाए। यह लड़ाई सिर्फ़ उन्नाव की एक पीड़िता की नहीं है, बल्कि हर उस महिला की है जो इस व्यवस्था में डर के साए में जीने को मजबूर है। यह लड़ाई लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई है। यह लड़ाई संविधान, बराबरी और इंसाफ़ की लड़ाई है। जब-जब सत्ता बलात्कारियों के साथ खड़ी होगी, तब-तब जनता को सड़कों पर उतरना होगा। जब-जब न्याय को कुचला जाएगा, तब-तब प्रतिरोध और तेज़ होगा। इतिहास गवाह है दमन से कभी इंसाफ़ नहीं रुका, और न ही रुकेगा।
वतन कुमार








 
 
 
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