झूठे मुकदमे में कॉ जितेंद्र पासवान को आजीवन सजा के खिलाफ बिहार में राज्यव्यापी प्रतिवाद मार्च
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आरवाईए के बिहार राज्य अध्यक्ष कॉमरेड जितेंद्र पासवान सहित दो साथियों को झूठे मुकदमे में आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के खिलाफ भाकपा (माले) और आरवाईए के राज्यव्यापी आह्वान पर बिहार के विभिन्न जिलों में व्यापक प्रतिवाद मार्च निकाले गए। सड़कों पर उतरे मजदूरों, किसानों, छात्रों और युवाओं ने इसे न्याय नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिशोध का फैसला बताते हुए न्यायपालिका से पुनर्विचार की मांग की।
वक्ताओं ने कहा कि 13 फरवरी को गोपालगंज जिला न्यायालय ने कॉमरेड जितेंद्र पासवान तथा कॉमरेड श्रीराम कुशवाहा को हत्या के एक कथित मामले में आजीवन कारावास और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इसी घटना में पांच अन्य निर्दोष लोग पहले से ही आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं। इससे पूरे मामले की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं और न्याय प्रक्रिया के दुरुपयोग की आशंका मजबूत होती है।
प्रतिवाद सभाओं को संबोधित करते हुए नेताओं ने आरोप लगाया कि यह पूरा मामला जदयू मंत्री सुनील कुमार द्वारा राजनीतिक प्रतिशोध का परिणाम है। वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में भोरे सीट से भाकपा(माले) उम्मीदवार के रूप में कॉमरेड जितेंद्र पासवान ने मजबूत चुनौती दी थी और मात्र लगभग 400 मतों के अंतर से पराजित घोषित किए गए थे, जबकि जदयू प्रत्याशी सुनील कुमार विजयी घोषित हुए।
जनता के बीच तेजी से बढ़ती उनकी लोकप्रियता सत्ता पक्ष के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही थी। वक्ताओं ने याद दिलाया कि इससे पहले भी भाकपा(माले) के चर्चित युवा नेता और पूर्व विधायक मनोज मंजिल को भी राजनीतिक साजिश के तहत हत्या के झूठे मामले में फंसाया गया था। यह घटनाएँ बताती हैं कि जनपक्षधर और संघर्षशील नेतृत्व को लोकतांत्रिक राजनीति से हटाने के लिए दमनात्मक तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। क्रांतिकारी युवाओं को राजनीतिक रास्ते से हटाने की यह दूसरी बड़ी घटना बताई जा रही है। सभा में वक्ताओं ने कहा कि कॉमरेड जितेंद्र पासवान भोरे क्षेत्र सहित पूरे तिरहुत प्रमंडल में दलितों, गरीबों और पिछड़े तबकों की आवाज बनकर उभरे थे। भूमिहीनों, खेत मजदूरों और बेरोजगार युवाओं के अधिकारों के लिए उनके संघर्ष ने उन्हें जनप्रिय बना दिया था। यही कारण है कि वे सत्ताधारी गठबंधन की आंखों की किरकिरी बन गए। आंदोलनकारियों का आरोप है कि जन आंदोलनों को कमजोर करने और जननेताओं को बदनाम करने के उद्देश्य से उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाया गया है।

वक्ताओं ने इस घटनाक्रम को व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए कहा कि देश में विपक्ष की आवाज को दबाने और “विपक्ष-रहित भारत” बनाने की सत्ताधारी राजनीति षड्यंत्र के तहत जनपक्षधर नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है। लोकतांत्रिक अधिकारों, असहमति की आवाज और जनसंघर्षों को कुचलने की यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। प्रतिवाद मार्च के दौरान यह सवाल भी जोरदार ढंग से उठाया गया कि एक ओर बिहार में बेटियों के साथ बढ़ती बलात्कार की घटनाएँ समाज को झकझोर रही हैं, वहीं दूसरी ओर अपराधियों को सजा दिलाने के बजाय उनके खिलाफ आवाज उठाने वाले सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं को ही झूठे मामलों में फंसाया जा रहा है। वक्ताओं ने कहा कि यह न्याय व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है और शासन की संवेदनहीनता को उजागर करता है। नेताओं ने कॉ जितेंद्र पासवान और उनके साथियों की तत्काल रिहाई, मामले की निष्पक्ष न्यायिक पुनर्समीक्षा तथा राजनीतिक प्रतिशोध की राजनीति पर रोक लगाने की मांग की। साथ ही चेतावनी दी गई कि यदि जननेताओं पर दमन जारी रहा तो राज्यभर में आंदोलन को और व्यापक तथा तेज किया जाएगा। यह प्रतिवाद केवल एक व्यक्ति के न्याय की लड़ाई नहीं, बल्कि लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और जनाधिकारों की रक्षा का संघर्ष है।
वतन कुमार










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