बिहार आज एक गहरे और खतरनाक दौर से गुजर रहा है। यह दौर राज्य सत्ता द्वारा संगठित अन्याय, दमन और भय के राज का है। एक ओर हत्या, लूट, बलात्कार, अपहरण और सामंती-माफियाई हिंसा आम जनता की रोज़मर्रा की सच्चाई बनती जा रही है। दूसरी ओर नीतीश–मोदी की साझा सरकार बुलडोजर को “सुशासन” का मुखौटा पहनाकर गरीबों, दलितों, महादलितों और मेहनतकशों पर सीधा हमला कर रही है। बिहार में आज कानून का नहीं, बल्कि सत्ता-संरक्षित अपराधियों और बुलडोजर का बोलबाला है। राज्य में अपराध बेलगाम हैं। छोटे-छोटे विवादों में गोलियाँ चल रही हैं, महिलाओं पर हिंसा बढ़ रही है, दलित–पिछड़ों पर हमले तेज हो रहे हैं। थाने, चौकियाँ और पूरा प्रशासनिक ढांचा या तो मूकदर्शक बना बैठा है या फिर सत्ता-समर्थित अपराधियों की ढाल। अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि सत्ता उनकी संरक्षक है। सुशासन का ढोल पीटने वाली सरकार की असलियत यह है कि जमीन पर जनता असुरक्षित है, भयभीत है और न्याय से वंचित है। इसी अराजकता ने समानांतर बिहार में बुलडोजर की राजनीति ने गरीबों की जिंदगी रौंद दी है। झोपड़ियाँ, झुग्गियाँ, कच्चे-पक्के घर जो किसी के लिए महल नहीं, बल्कि जीवन की आख़िरी उम्मीद हैं, उन्हें एक झटके में मिटा दिया जा रहा है। न पुनर्वास, न वैकल्पिक व्यवस्था, न मानवीय संवेदना सीधा बुलडोजर। यह कोई प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि सत्ता-प्रायोजित हिंसा है। यह हमला सिर्फ झोपड़ियों पर नहीं, बल्कि गरीबों के सपनों, उनके आत्मसम्मान और उनके अस्तित्व पर है। यह बुलडोजर राज दरअसल संविधान पर सीधा हमला है। संविधान हर नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि बिना वैकल्पिक व्यवस्था किए किसी को विस्थापित नहीं किया जा सकता। खुद बिहार सरकार ने कई बार भूमिहीनों को पाँच–पाँच डिसमिल ज़मीन देने की घोषणा की है। लेकिन हकीकत यह है कि न ज़मीन मिली न बसावट, उल्टे जिनके पास सिर छुपाने को छत थी, उसे भी ज़मींदोज़ कर दिया गया। अदालतों की प्रक्रिया, मानवीय मूल्यों और लोकतांत्रिक अधिकारों को रौंदते हुए बुलडोजर चलाना न्यायपालिका और लोकतंत्र दोनों का अपमान है।
यह वही सरकार है जो चुनाव के समय गरीबों के दरवाज़े पर हाथ जोड़कर जाती है, योजनाओं और खातों में भेजी गई रक़म के सहारे लोगों को बहलाती है, और सत्ता में आते ही उन्हीं हाथों से उनके घर उजाड़ देती है। अपराध और बुलडोजर ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अपराधियों को संरक्षण और गरीबों पर दमन यही नीतीश-मोदी सरकार की असली नीति है।
बिहार की जनता यह सब चुपचाप सहने वाली नहीं है। इतिहास गवाह है कि इस धरती ने जुल्म के खिलाफ हमेशा बगावत की है। किसान आंदोलनों, मजदूर संघर्षों और छात्र–युवा आंदोलनों की परंपरा इस मिट्टी में रची-बसी है। आज समय की मांग है कि इस दमनकारी सत्ता के खिलाफ एकजुट, संगठित और निर्णायक जनसंघर्ष खड़ा किया जाए। गाँव, टोला,शहर हर जगह आवाज़ बुलंद करनी होगी। नीतीश–मोदी सरकार को यह भ्रम छोड़ देना चाहिए कि डर के सहारे राज किया जा सकता है। बुलडोजर से झोपड़ी गिर सकती है, लेकिन संघर्ष की चेतना को कुचला नहीं जा सकता। गरीब का घर उजाड़कर सत्ता बचाने का सपना कभी पूरा नहीं होगा। जब जनता उठती है, तो सत्ता के किले ढह जाते हैं। आज बिहार की लड़ाई सिर्फ अपराध और बुलडोजर के खिलाफ़ नहीं है। यह लड़ाई सम्मान, अधिकार और संविधान को बचाने की है। यह लड़ाई उस भविष्य की है जहाँ गरीब सुरक्षित हो, इंसाफ सुलभ हो और सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह हो।
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