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इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र-आंदोलन की जीत विश्वविद्यालय बचाने की एक उम्मीद है!


इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र पीने के लिए साफ़ पानी, स्वच्छ शौचालयों और लाइब्रेरी में पढ़ाई की समय सीमा को बढ़ाने जैसे मुद्दों को लेकर समय-समय पर आंदोलन करते रहे हैं। नियम अनुशासन के नाम पर छात्रों से बदसलूकी भी नई नहीं है, जैसे कि आईडी कार्ड चेक करने के नाम पर छात्र-छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार किया जाना। दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक केंद्रीय विश्वविद्यालय होने के बावजूद इलाहाबाद विवि. इस तरह की मूलभूत सुविधाओं के अभाव का शिकार तो रहा ही है साथ ही आवाज़ उठाने पर छात्रों को प्रशासन के दमनकारी और तानाशाही रवैये को झेलना पड़ता है। यह शिक्षा व्यवस्था के प्रति हो रही गंभीर लापरवाही का जीता-जागता नमूना है। सिर्फ यही नहीं, विभिन्न पाठ्यक्रमों की फीस में 400% तक की वृद्धि की गई और पीएचडी की फीस को ₹500 से बढ़ाकर लगभग ₹16000 कर दिया गया गया। यही कारण है कि विश्वविद्यालय द्वारा इस प्रकार के आर्थिक दमन के चलते, साथ ही आधारभूत संरचनाओं के छिन जाने से छात्र-छात्राओं में अनचाहा आक्रोश भरता रहा है। छात्रों की मूलभूत समस्याओं को सुनने की बजाय उनके साथ दमनात्मक व्यवहार का यह सिलसिला कोविड के बाद की परिस्थितियों में लगातार बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। कुल मिला कर विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक परिवेश को संकुचित किया जा रहा है। इसी सिलसिले के तहत एक ऐसा वाकया हुआ जिसमें 'फ़ैज़ अहमद फ़ैज़' पर कार्यक्रम करने के लिए कुछ छात्र अनुमति लेने गए लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने अनुमति देने की बजाय उनके हाथों में निलंबन और परिसर प्रवेश से प्रतिबंधित किए जाने का आदेश थमा दिया। छात्रों की आवाज़ को दबाने का ये सिलसिला कोई पहला मामला नहीं है बल्कि लगातार चली आ रही छात्र विरोधी साजिशों का हिस्सा है जिसमें किसी भी प्रकार के लोकतांत्रिक और छात्रोपयोगी कार्यक्रम पर रोक लगाना, मूलभूत सुविधाओं को लेकर आवाज़ उठाने पर छात्रों के खिलाफ़ दमनात्मक कार्रवाई करना आदि शामिल रहा है।

छात्रों का यह आक्रोश तब एक गंभीर आंदोलन के रूप में तब्दील हो उठा, जब विश्वविद्यालय की एक छात्रा सौम्या, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर कार्यक्रम करने के लिए 20 नवंबर, 2025 को विश्वविद्यालय प्रशासन की अनुमति लेने के लिए प्रॉक्टर ऑफ़िस जाती है, पर अनुमति देने की बजाय उसे निलंबित कर परिसर प्रवेश से प्रतिबंधित कर दिया जाता है। छात्रा ने यह भी आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन में बैठे प्रॉक्टर राकेश सिंह द्वारा उसके साथ जान बूझ कर अभद्र व्यवहार और गाली-गलौज की गई, जिस कारण वह सार्वजनिक अपमान के साथ-साथ मानसिक उत्पीड़न का शिकार भी हुई है। इतना ही नहीं दो-तीन घंटे तक छात्रों की उक्त टीम को प्रॉक्टर ऑफिस में बैठा कर मानसिक रूप से टॉर्चर किया गया। घटना की जानकारी मिलते ही, आम छात्रों सहित, विश्वविद्यालय में कार्यरत विभिन्न छात्र संगठनों ने इस गैर मानवीय छात्र एवं महिला विरोधी प्रशासनिक रवैये के खिलाफ़, फ़ौरी कार्रवाई की मांग उठाई। विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर राकेश सिंह द्वारा, छात्रों के साथ, पहले भी इस तरह की हिंसा और गाली-गलौज की वारदातें दर्ज की जा चुकी हैं। राजनीति विज्ञान के शोधार्थी मनीष कुमार का निलंबन, अध्यक्ष विवेक सुल्तानवी के ऊपर लाठियों से हमला, विश्वविद्यालय के छात्र अभिषेक गुप्ता को प्रॉक्टर ऑफिस में बुलाकर बेरहमी के साथ पीटना तथा अब फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर कराये जा रहे कार्यक्रम को लेकर, छात्रा के निलंबन का आदेश जारी करना इत्यादि राकेश सिंह की कुख्यात उपलब्धियां रही हैं।

छात्रों ने इन सभी घटनाओं के ऊपर तीखा प्रतिरोध दर्ज किया लेकिन जैसा कि हम सभी जानते हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा, परिसरों में डर, दमन और तानाशाही का माहौल जान बूझ कर कायम रखा जाता है। इसी कारण प्रॉक्टर राकेश सिंह जैसे गंभीर अपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों को प्रमोशन दिया जाता है जो बिना झिझके और ज़रूरत पड़ने पर हर प्रकार की नैतिक, मानसिक और शारीरिक हिंसा का प्रयोग कर प्रशासन की मनमानी नीतियों को लागू कराएं। लाठियों से हमला करने वाले राकेश सिंह को गैरसंवैधानिक तरीके से प्रोफेसर पद देकर 'गांधी एंड पीस स्टडी केंद्र' का डायरेक्टर बनाया जाना इसका उदाहरण है। इन तमाम सिलसिलेवार घटनाओं के चलते हालिया समय में, लंबे समय से आक्रोशित छात्रों के हुज़ूम ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मुख्य लाइब्रेरी गेट को, 3 दिनों के लिए बंद कर दिया, और मजबूती से अपनी मांगों पर अड़े रहे।

करीब 3 दिन तक चले इस लंबे संघर्ष के बाद विश्वविद्यालय परिसर में कई तरह के बदलाव देखने को आए। आम तौर पर जिस विश्वविद्यालय को शाम 6:00 बजे के बाद छात्र-छात्राओं के लिए प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया जाता था, उसी विश्वविद्यालय में आंदोलन कर रहे छात्रों ने गीत, संगीत, कविता पाठ और बेहतरीन भाषणों के साथ दिनों रात अपनी रचनात्मक क्षमताओं और अभिव्यक्ति से हर किसी को रु-ब-रू कराया। बेशक, यह घटना छात्रों के लिए 1857 में आजमगढ़ या बलिया जैसे क्षेत्रों में मिली उस आंशिक आज़ादी की तरह ही थी जिसमें पूरी आज़ादी मिलना अभी बाकी था। आंदोलन के दौरान विश्वविद्यालय रात भर खुला रहा और छात्र बेहद सुव्यवस्थित और संगठित तरीके से लोगों के बीच परिसर तथा देश-समाज के जुड़े मुद्दों पर अपने विचार साझा करते रहे। इस आंदोलन ने छात्रों की व्यापक सामूहिकता की भावना, आंदोलन के जुझारूपन तथा संघर्ष के ज़ज्बे को उजागर किया। विश्वविद्यालय में काम करने वाले अलग-अलग प्रगतिशील लोकतांत्रिक छात्र संगठनों के लोग, एक साथ एका बनाकर इस तानाशाही निज़ाम के खिलाफ मजबूती से डटे रहे।परिणाम यह हुआ कि विश्वविद्यालय और जिला प्रशासन जन दबाव के चलते छात्रों की मांगों को सुनने के लिए बाध्य हो गए।

छात्र आंदोलन के संदर्भ में जिला प्रशासन की मध्यस्थता के तहत विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ छात्र समूह की वार्ता कराई गई जिसमें छात्रों के मुद्दों; निलंबन वापस लेने, साफ पानी और शौचालय की तत्काल व्यवस्था करने, लाइब्रेरी की समय सीमा को बढ़ाकर पूरी रात के लिए लागू करने तथा छात्र संघ बहाली जैसे लोकतांत्रिक मुद्दों के संबंध में बातचीत हुई। छात्रों के बढ़ते आंदोलन व दबाव के कारण विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा, तत्काल पूरा की जाने वाली मांगों जैसे, विश्वविद्यालय परिसर में लोकतांत्रिक परिवेश बहाल करने, निलंबन को वापस लेने, आंदोलन में शामिल छात्रों के ऊपर किसी भी तरह की कार्रवाई न किए जाने और लाइब्रेरी के टाइम को बढ़ाने संबंधी मांगों को यथाशीघ्र पूरा करने का आश्वासन दिया गया। तत्काल लिखित रूप से छात्रों का निलंबन वापस लेने की मांग को पूरा किया गया साथ ही शौचालय और साफ पानी के लिए काम भी शुरू करवा दिया गया। लंबे समय के बाद विश्वविद्यालय के छात्रों ने संघर्ष करके, लड़ करके अपने अधिकारों की बहाली कराई। इस आंदोलन की खास बात यह थी कि छात्रों के साथ-साथ छात्राएं भी मुस्तैदी के साथ इस आंदोलन में डटी रहीं जिस कारण विश्वविद्यालय प्रशासन को अपनी इन हरकतों से पीछे हटना पड़ा। आंदोलन में शामिल राजनीति विज्ञान विभाग के शोधार्थी तथा आइसा प्रदेश अध्यक्ष मनीष कुमार के ऊपर इस आंदोलन में शामिल होने के कारण दोबारा निलंबन और निष्कासन करने की कोशिश की जा रही थी। जिसके तहत पूरा विश्वविद्यालय महकमा; रजिस्टार, डीएसडब्ल्यू और प्रॉक्टर आदि मनीष कुमार के खिलाफ़ सक्रिय हो गए थे लेकिन निश्चित तौर पर यह आंदोलन के दबाव का ही नतीजा था कि विश्वविद्यालय प्रशासन को इस शर्मनाक हरकत से पीछे हटना पड़ा।


इलाहाबाद विश्वविद्यालय देश के उन विश्वविद्यालयों में से एक रहा है जिसने शैक्षणिक, सामाजिक और राजनीतिक तमाम क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यहां की विरासत, पढ़ने-लिखने के साथ-साथ छात्र-छात्राओं को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने तथा बदलाव के लिए संघर्ष करने की रही है। किसी समय विश्वविद्यालय में होने वाला छात्र संघ चुनाव, न सिर्फ लोकतंत्र की नर्सरी था बल्कि समाज में व्याप्त तानाशाही और गैरबराबरी के खिलाफ़ छात्रों की आवाज़ को बुलंद करने वाला एक मजबूत स्तंभ भी था। 2018 से विश्वविद्यालय में छात्र संघ को प्रतिबंधित कर दिया गया है तथा छात्रों की एकजुटता और सामूहिकता में उठने वाली आवाज़ को भरसक दबाया जा रहा है। छात्रसंघ पर लगाया गया प्रतिबंध आने वाले समय में छात्र विरोधी 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020' को जबरन विश्वविद्यालय पर थोपे जाने के क्रम में ही किया गया है। साथ ही यह झूठ फैलाया जा रहा है कि विश्वविद्यालय को आर्थिक रूप से स्वायत्त बनाने में इस नीति का सीधा योगदान है। इस फर्जी आर्थिक स्वायत्तता का मतलब साफ़ है कि मौजूदा सरकार शिक्षा व्यवस्था की ज़िम्मेदारी से अपने आप को पीछे खींच रही है। इसका परिणाम ये होगा कि शिक्षा का पूरा भार छात्रों की जेब पर आएगा। फीस बढ़ाई जाएगी और आम छात्र शिक्षा के अधिकार के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक बराबरी से भी वंचित कर दिया जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत मल्टीपल एंट्री और एग्जिट की व्यवस्था को पुख्ता करना भी इसी की एक कड़ी है। विश्वविद्यालय में सामाजिक न्याय की बात करने वाले या वंचित तबकों से आने वाले छात्र-छात्राओं और अध्यापकों के साथ उत्पीड़न, उन पर निलंबन और निष्कासन की मार या फिर 'नॉट फाउंड सूटेबल' बताकर उनके प्रवेश को प्रतिबंधित करना, ये सब मुद्दे एक बड़ी साज़िश की छोटी-छोटी कड़ियों के रूप में गौरतलब हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने के क्रम में ही विश्वविद्यालय को तानाशाही के पायलट प्रोजेक्ट के रूप में तब्दील किया जा रहा है।

इन सब गंभीर विषयों पर छात्रों की एकजुटता और आंदोलन की सख्त जरूरत को महसूस किया जाना ही वह नतीजा है जिसने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र संघर्ष को यह जीत दिलाई है। यह जीत राष्ट्रीय शिक्षा नीति और शिक्षा के निजीकरण के रास्ते पर भेजे जाने के खिलाफ़ छात्रों के लगातार संघर्ष और एकजुटता की जीत है। जिन इंकलाबी शायर 'फ़ैज़ अहमद फ़ैज़' पर आधारित प्रोग्राम को ऑर्गेनाइज कराने के नाम पर छात्रों का निलंबन किया गया था, उन्हीं की राह पर चल कर आज छात्र संघर्ष को बल मिला है। और संघर्ष की इसी जीत के दम पर आने वाले समय में विश्वविद्यालय और शिक्षा व्यवस्था की बेहतरी की एक उम्मीद हर किसी में जगी है। एक बेहतर समाज बनाने का सपना फिर से जिंदा हो उठा है - "लंबी है गम की शाम मगर, शाम ही तो है.."।

इंकलाब जिंदाबाद।


 
 
 

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